बिहार में एक युग का 'मौन' अंत: जब सत्ता का केंद्र रहे नीतीश कुमार अकेले ही अपनी गाड़ी का इंतज़ार करते दिखे
The 'Silent' End of an Era in Bihar
पटना। The 'Silent' End of an Era in Bihar, भारतीय राजनीति में सत्ता का हस्तांतरण अक्सर संघर्ष, समीकरण और महत्वाकांक्षाओं के बीच होता है। लेकिन, कभी-कभी इतिहास ऐसे पल भी दर्ज करता है, जब सत्ता से मोहभंग नहीं, बल्कि एक सधी हुई दूरी दिखाई देती है।
बिहार में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम कुछ ऐसा ही दृश्य लेकर आया, जब राज्य के मुखिया रहे नीतीश कुमार ने दो दशकों तक राज्य का नेतृत्व करने के बाद बेहद शांत और संयमित तरीके से सत्ता का हस्तांतरण कर दिया।
करीब 21 वर्षों तक बिहार की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे के केंद्र में रहे नीतीश कुमार राज्य को विकास, सुशासन और बुनियादी ढांचे के नए आयाम देत रहे। उनके कार्यकाल में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलावों की चर्चा होती रही। ऐसे नेता का सत्ता से हटना सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं।
एक कोने में शांत बैठे दिखे नीतीश कुमार
बुधवार को राजभवन परिसर में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह के दौरान दृश्य कुछ अलग ही था। मंच पर नई सरकार के चेहरे थे, लेकिन एक कोने में बैठे नीतीश कुमार का शांत और स्थिर चेहरा पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक अलग अर्थ दे रहा था। न उनके साथ मंत्रियों का काफिला था, न ही प्रशासनिक अधिकारियों की भीड़।
नीतीश वही नेता थे, जिनके इर्द-गिर्द वर्षों तक सत्ता का केंद्र घूमता रहा। शपथ ग्रहण के बाद उनका अपने सरकारी वाहन के लिए कुछ क्षण प्रतीक्षा करना भी एक प्रतीकात्मक दृश्य बन गया। राजनीतिक विश्लेषक इसे सत्ता से उनके सहज अलगाव के रूप में देख रहे हैं। न कोई सार्वजनिक असंतोष, न कोई कटाक्ष, सिर्फ एक मौन स्वीकृति।
इस घटना को कई नजरियों से देखा जा रहा
राजनीतिक हलकों में इस घटना को कई नजरियों से देखा जा रहा है। एक पक्ष इसे गठबंधन राजनीति की मजबूरी मान रहा है, तो दूसरा इसे व्यक्तिगत शैली और राजनीतिक संस्कार का उदाहरण बता रहा है। दरअसल, भारतीय राजनीति में जहां पद और प्रभाव को बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाते हैं, वहां इस तरह का शांत हस्तांतरण दुर्लभ माना जाता है।
नीतीश कुमार की छवि हमेशा एक संयमित और कार्य-केंद्रित नेता की रही है। उन्होंने कई बार सत्ता परिवर्तन के दौर देखे, लेकिन इस बार का दृश्य अलग था। यह सत्ता से विदाई का नहीं, बल्कि एक सधे हुए विराम का संकेत था।
बिहार की राजनीति अब एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन पीछे छूटे इस दृश्य ने यह जरूर याद दिलाया है कि सत्ता का असली अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि उसे छोड़ने की क्षमता भी है।